उत्तराखंड के राज्यपाल ले.ज. गुरमीत सिंह (रि) से लोकभवन में पेजावर मठ, उडुपी के पीठाधीश्वर विश्वप्रसन्न तीर्थ स्वामीजी ने भेंट की। इस अवसर पर राज्यपाल ने स्वामीजी के उत्तराखण्ड आगमन को प्रसन्नता का अवसर बताया। भेंट के दौरान भारतीय संस्कृति, देश की समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा और समाज में संतों की प्रेरणादायी भूमिका सहित विभिन्न विषयों पर सार्थक संवाद हुआ। राज्यपाल ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा देश की पहचान का महत्वपूर्ण आधार है। संत परंपरा ने भारतीय समाज को सदैव आध्यात्मिक मूल्यों, सेवा और सद्भाव की दिशा में प्रेरित किया है।
उन्होंने कहा कि संतों और आध्यात्मिक गुरुओं का समाज के बीच संवाद लोगों को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। स्वामीजी के उत्तराखण्ड आगमन के अवसर पर राज्यपाल ने भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत से जुड़े विषयों पर विचारों का आदान-प्रदान किया। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड की भूमि प्राचीन काल से ही साधना, आध्यात्मिक चिंतन और संत परंपरा से जुड़ी रही है। ऐसे में देश की विभिन्न आध्यात्मिक परंपराओं के संतों का उत्तराखण्ड आगमन सांस्कृतिक संवाद को और व्यापक बनाता है। इस दौरान भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत और वर्तमान पीढ़ी तक उसके मूल्यों को पहुंचाने से जुड़े विषयों पर भी चर्चा हुई। राज्यपाल ने स्वामीजी के साथ हुए संवाद को सार्थक बताते हुए उनके उत्तराखण्ड आगमन का स्वागत किया।
भारतीय संस्कृति और संत परंपरा पर हुआ संवाद
राज्यपाल और पेजावर मठ के पीठाधीश्वर विश्वप्रसन्न तीर्थ स्वामीजी के बीच हुई भेंट में भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई। राज्यपाल ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत विविध परंपराओं और आध्यात्मिक विचारों से समृद्ध रही है। संतों ने समाज में सेवा, संस्कार और आध्यात्मिक चेतना के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि आधुनिक समय में भी संतों और आध्यात्मिक संस्थाओं के माध्यम से समाज को सकारात्मक दिशा देने के प्रयास महत्वपूर्ण हैं। उत्तराखण्ड की पहचान भी देश की प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा और तीर्थ संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है। चारधाम सहित राज्य के विभिन्न धार्मिक और आध्यात्मिक स्थल देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। राज्यपाल ने कहा कि भारतीय संस्कृति के मूल्यों और आध्यात्मिक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए निरंतर संवाद आवश्यक है।
